khariya sodha

All about my Village Khariya sodha (Pali ) Rajasthan. PIN 306001 A small efforts for Collection of Sodha Rajput Vanshavali and History

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Saturday, February 23, 2019

सोढ़ा और रामदेव जी महाराज




सोढ़ा जी छे भाई थे और ऐक बहन -
सोढ़ा जी ! ! साखला जी ! ! वाधो जी ! ! जेतसी जी ! ! जेसगदेव जी ! ! परब जी ! ! केसर कुंवर (संचियाय देवी ) हुवे। संचियाय देवी सोढ़ा जी के बहन थे, और वो देवी शक्ति थे।  आज भी सोढ़ा कुल मे उनकी पूजा होती हे ? 
ऐसे परमार कुल मे सोढ़ा जी के बाद उनके वंशज़ सोढ़ा जी के बाद सोढ़ा सरनेम चली। 
 
सोढ़ा जी के कुल मे भी पीछे उनके वंशजों के नाम से सोढ़ा कुल मे भी बहुत  सारे अलग अलग सोढ़ा सरनेम हूवी। 
थोड़ा उनका परिचय
👉सोढ़ा जी (दो पुत्र हुवे ) 👉चामकदेव जी (और ) सिंधल जी 
 
सिंधल जी के पीछे उनका भी परिवार सिंधल सोढ़ा से आज उनके वंशज सरनेम हे और ये सिंधल कुल मे कूवरी कमलावती हुवे जिनका विवाह राठौड़ कुल के (जुजार ) इस्ट देव पाबुजी के साथ हुवा। 
और सिंधलो की कूवरी नेतलदे के साथ श्री रामदेवजी का विवाह हुवा। 

और चामकदेव जी के 
वंश मे भी बहोत से सरनेम के सोढ़ा हुवे चामक देव जी के वंश मे देव शिरोमणि पिथौराजी दादा हुवे। 


सन्दर्भ एवं आभार - 
https://kshatriyaitihas.blogspot.com
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सोढा एवं सच्चियाय माता

 सोढा परमार का इतिहास 

परमार कूल मे राजा सिधूराज हूवे ( राजा धधमार ) ऊनके नो पुत्र हुवे , धरणीवराह, आलपाल, भोजराज, हासूजी, जोगराज, अजेसिंह, गजमाल, सामंत, भाण,
इन नो भाई ओ ने नवकोटी मारवाड राजधानी स्थापित की इनका ऐक दोहा,
हुवो लूधरवे भाण, मंडोवर हूवो सामंत
गढ़ पूंगल गजमाल, अजमेर अजेसिंह
जोगराज घरढाट (अमरकोट) , हूवो हंसो पारकर
आलपाल अरबध, भोजराज जालोर
नवकोट केराणु परमार थाप्यो
धरणीवराह घरभाया बांट जु जु कियो
धरणीवराह परमार की पीणी मे बाहडराय परमार हूवे, उनहो ने संवत 1196 मे बाडमेर राज्य की स्थापना की, बाहडराय परमार शिव भक्त थे ऊनहो ने कोट केराडु मे शिव मंदिर की स्थापना की ओर आबावाडी मे महल भी बनवाया,
बाहडराय परमार के तीन पुत्र थे, छाडराय , संग्रामराय , चामणराय, उनके वंशज केरवाडा परमार से जाने जाते हे.
छाडराय परमार ने अपनी राजधानी शिवकोटडा मे स्थापित की ,
कर्म संजोग छाडराय परमार का विवाह इन्द्र की परी पहुंपावती से हूवा, जिनसे सोढा जी, सांखला जी, ओर देवी शक्ति सच्चियाय ( कल्याण कुंवर _केसर कुंवर ) का जन्म हुवा, 
परमार वंश मे सोढा जी परमार से सोढा साख चली,
उस समय बाडमेर के राजा को कोढ की बिमारी हूवी बहोत दवाइ या की पर कुछ फर्क नही हुवा, तभी कुछ ज्योतिष विदवानो ने कहा बाडमेर राज्य मे भुताण नाम का ऐक कुवा हे वहा हर पूनम को भुतो का मेला लगता हे, पर कोइ शूरवीर ही उस कूवे का पानी ले आ सकता हे. ओर उस पानी से राजा की बिमारी नाबूद होगी,
ये बात छाडराय परमार को पता चली ओर उन्होंने ये बीडा उठाया ,
पूनम के दिन छाडराय परमार अपने झालरीया जाती के ऊठ पर सवार होकर निकले तब भुताण कुवे के आगे ऐक सरोवर के पास तीन परी ओने ऊनको बुलाया ओर छाडराय की परीक्षा की ओर पुछा आप कहा जा रहे हो, तब छाडराय परमार ने सारी बात बताई, ये शून कर परीओ ने कहा हमे राजा इन्द्र से श्राप मिला हे की मृत्यु लोक के मानव से विवाह का आप हम तीन मे से ऐक परी से विवाह करे तो हमे श्राप से मुक्ति मिले, तभी छाडराय परमार ने पहुंपावती परी पर हाथ रख कहा मे इस से विवाह करुगा,
ओर वहा से छाडराय परमार परी ओ को वचन देकर निकले, जब वो भुताण कुवे के पास पहुंचे वहा मानो ऐक नगर हो वहा कही भुत पिचास थे, निडर होकर छाडराय कूवे के पास पहुंचे, ओर पानी भरकर वहा से निकल पडे,
सरोवर के पास आकर देखा तो पहुंपावती बुढी ओरत के रुप मे खडी थी ओर दो परी ने कहा परमार ये तो बूढीया हे तुम इस से केसे विवाह करोगे, हम दोनो मे से ऐक से विवाह करो,
तब छाडराय ने कहा मे परमार वंश का राजपूत हु मेरा वचन धर्म रजपूती हे मेरा वंश राजपूत हे मे केसे फिरू मेरे वचन से , ये सुनकर पहुंपावती अपने अशली स्वरूप मे आ गइ ओर कहा मे आपसे विवाह करूगी पर मेरे तीन वचन आप याद रखना
1 मेरे लिऐ ऐक अलग महल बनवाए ओर ऊस महल के आगे कोइ स्त्री पुरुष आऐ नही
2 आप जब भी महल मे आवो आवाज लगाके आवो
3 मेरी खबर ओर लोगो को हुवी तो मे वचन अनुसार इन्द्र लोक चली जावुगी,
भुताण कूवे का पानी से बाडमेर के राजा की बिमारी नाबूद हो गई,
ओर वहा से आकर छाडराय परमार ने परी पहुंपावती से विवाह किया,
ओर आसपास मे कहा इस महल के करीब कोइ आऐ नही मे साधना कर रहा हू.
ओर ऐक अलग महल बनवाया
छाडराय परमार को परी रानी पहुंपावती से सन्तान हुवे
सोढा जी, सांखला जी, वांघोजी ,जेतसी, जेसंगदेव, परब, शक्ति सच्चियाय देवी ,
महल मे सोढा जी ओर सांखला जी खेल रहे थे
इन कुंवरो को आसपास के लोगो ने देखा , महल मे तो जा नही सकते इस लिए जिज्ञासा हेतु जानने के लिऐ ऐक युक्ति की ये बच्चे किसके है,
तभी उन लोगो ने ढढेरा पीटवाया की अश्व शाणा मे से धोडे निकल गये हे अपने अपने बच्चो को संभाल ना,
ये सुनकर पहुंपावती ने महल मे से हाथ लबा कर के दोनो बच्चो को ऊठाकर महल मे ले लिया,
ये चमत्कार आसपास के लोगो ने देख लिया,
ये ढढेरा सुनते महल मे जल्दी बाजी मे महल मे छाडराय परमार पहुंपावती को बीना आवाज कीऐ महल मे दाखिल हूवे,
बिना आवाज दाखिल हूवे छाडराय परमार को देख परी रानी पहुंपावती ने कहा मेरा वचन पूरा हूवा ,
मे अब इन्द्र लोक जावुगी,
छाडराय परमार ने बहुत विनती की पर वचन अनुसार पहुंपावती इन्द्र लोक चले गये, ओर जाते समय वचन दिया मे मेरे पुत्र परिवार मे आशिर्वाद देने आवुगी,
ओर इस तराह छाडराय परमार जी के पुत्र सोढा जी से परमार वंश मे सोढा साख चली 
सोढा जी के दो पुत्र हूवे चामक देव जी, ओर सिंधल जी ओर आज इनी दो भाई ओ का परिवार आज सोढा परमार से जाना जाता हे.
पुत्री सच्चियाय सती स्वरूप होकर शक्ति हूवे,


आभार एवं संदर्भ -

✍🏻 राजूभा डी सिंधल
(राजराजोजी )

अखिल भारतीय बरगाही क्षत्रिय महासंघ





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पाबू जी महाराज और सोढा

  • जन्म – 1239 ई. में
  • जन्म स्थान – कोलुमण्ड गाँव, फलौदी (जोधपुर)
  • पिता – धाँधल जी राठौड़  
  • माता – कमलादे
  • पत्नी – फुलमदे/सुपियार दे सोढ़ी
  • फुलमदे अमरकोट के राजा सूरजमल सोढा की पुत्री थी
  • पाबूजी ‘ऊँटों का देवता’, ‘गोरक्षक देवता’ तथा प्लेग रक्षक देवता’ के रूप में प्रसिद्ध है।
  • पाबूजी को ‘लक्ष्मण का अवतार’ माना जाता है।
  • ऊँटों को पालक जाती राईका / रेबारी /देवासी के अराध्य देव पाबूजी है।
  • पाबूजी की जीवनी ‘पाबू प्रकाश’ के रचयिता – आशिया मोड़जी
  • हरमल व चांदा डेमा पाबूजी के रक्षक थे।
  • माघ शुक्ल दशमी तथा भाद्रपद शुक्ल दशमी को कोलुमण्ड गाँव (फलौदी, जोधपुर) में पाबूजी का प्रसिद्ध मेला भरता है।
  • पाबूजी के पवाड़ें / पावड़े (गाथा गीत) प्रसिद्ध है, जो माठे वाद्य यंत्र के साथ गाये जाते है।
  • प्रतीक चिन्ह – भाला लिए हुए अश्वारोही तथा बायीं ओर झुकी हुई पाग।

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Tuesday, February 14, 2017


ENTRANCE GATE OF KHARIYA SODHA (RAVLI POL)

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Sunday, January 22, 2017

VEER YODHA SODHA / वीर योद्धा सोढा

जब एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए सैंकड़ो सोढा-परमार राजपूतो ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया


जब एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए सोढा-परमार राजपूतो ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया...!!!

एक ऐसी अनोखी घटना जिसमे एक क्षत्राणी अपने वीर पुत्र की चिता के साथ सती हुई।

“शरणे आयो सोपे नहीं राजपुतारी रीत, धड गिरे पर छोड़े नहीं खत्री होय खचित”
अंग पोरस, रसणे अमृत, भुज परचो रजभार
 सोढा वण सूजे नहीं होय नवड दातार...|| १ ||
(सोढा-परमार राजपूतो के हाथ से जो दान मिलता हे, उनकी जीभ से जो अमृत बरसता हे और उनकी भुजाओ में जो ताकत होती हे वैसे और किसी में नहीं होता)

बात हे विक्रम सवंत 1214 की जब सिंध के थरपारकर में सतत सात साल तक बारिश न होने की वजह से अकाल की स्थिति पैदा हो गई थी जिसकी वजह से वहा के परमार राजा रतनसिंह के बेटे लखधीरसिंह अपनी प्रजा और गोचर के साथ पानी की खोज में सौराष्ट्र के वढवान रियासत में मुली गाव के पास आकर रुके | वहा के उस समय के राजवी विशणदेव वाघेला थे | लखधीरसिंह ने उनसे यहाँ पे रुकने के लिए और अपनी गायो के लिए घास चराने की मांग की, विशणदेव वाघेला अति उदार मन के होने के कारण उन्होंने गायो को चराने के साथ साथ वहा आजू-बाजु की सभी ज़मीन उनको रहेने के लिए दे दी |
 
         धीरे धीरे वहा पर लखधीरसिंहजी और उनके साथ सिंध में से आये लोग वह पे शांति-खुशहाली से रहेने लगे उन्होंने मुली में अपने एक बड़े गढ़ का भी निर्माण कर लिया | परमार राजपुतो की खुशहाली देखकर विशणदेव वाघेला की उपपत्नी जो की सायला के चभाड जाति की थी वो बहुत इर्ष्या करती थी, और मनोमन इनको सबक सिखाने की सोचती रहेती थी | एक बार जब सायला से राणी के भाई वढवान को पधारे तब उन्होंने अपने भाई के सामने परमार राजपूतो के बारे में कई खरी खोटी बाते बताकर उनको परमार राजपुतो को सबक सिखाने के लिए उकसाया |

हालाकि लखधीरसिंहजी और विशलदेव वाघेला के बिच में सबंध बहुत अच्छे होने की वजह से राणी के भाई परमार राजपुतो पर सीधा हमला तो नहीं कर सकते थे, इसलिए वे अपने साथ अपने साथियो और विशलदेव वाघेला के सैन्य से कुछ लोग लेकर कुल ५०० आदमियो को लेकर मुली के पास आकर शिकार करने लगे | उनको जब किसी हिरण या अन्य प्राणी शिकार के लिए नहीं मिला तब उन्होंने तीतर जाती के एक पक्षी को तीर मारा | घायल तीतर जाकर मुली के परमार राजपुतो की हद में गिर पड़ा जिसे देखकर सभी चभाड घोड़े पर चढकर उसके पीछे जाने के बहाने परमार राजपुतो को सबक सिखाने के लिए चल पडे, जिसका दुहा हे की...

जंगल तेतर उडियो, आवयो राजदुवार ||
चभाड सहु घोड़े चड्या बांधी उभा बार || १ ||

       इस तड़पते हुए तीतर को देखर लखधीरसिंहजी की राणी जोमबाई ने उसे हाथ में उठा लिया और कहा “डरना मत शरणागत की रक्षा करना क्षत्रियो का धर्म हे”,

अब तुम मेरे पास आए हो तुम्हे कुछ नहीं होगा | इसको देखकर चभाड लोगो ने कहा की “इसे हमें देदो ये हमारा शिकार हे”, जोमबाई ने जवाब दिया ये घायल तीतर पक्षी हमारे इलाके में आकर गिरा हे इसलिए वो हमारा शरणागत हे, और शरण आने वाले की रक्षा करना क्षत्रियो का धर्म रहा हे और हम वही करेंगे |
 इसको सुनकर शिकारियों ने कहा की हमारा शिकार हमें दे दो या लड़ने को तैयार हो जाओ |

तब जोमबाई ने जवाब दिया की “इ खांडा न खेल अमने न सिखववाना होय”(क्षत्रियो को कभी लड़ना सिखाया नहीं जाता वो मा के पेट के सिख कर आते हे) |
जिसे सुनकर चभाड शिकारी उनके लोगो पर टूट पडे | इसे देखकर जोमबाई ने अपने बेटे “मुंजाजी” से आह्वान किया की...

मुंजाने माता कहे,सुण सोढाना साम |
दल में बल रखो और करो भलेरा काम ||
मुंजा तेतर माहरो, मांगे दुजण सार |
गर्व भर्या गुजरात धणी, आपे नहीं अणवार ||

(मुंजाजी को माता ने कहा की सुण सोढा वंशज, अब भलाई करने का वक़्त आ गया हे, ये तीतर मेरे पास शरणागत आया हे, अब तुजे मेरे दूध का कर्ज़ चुकाना हे और दिखाना हे हमारे जमीन पे आये हुए शरणागत को हम किसी को नहीं सोपते)

जिसे सुनकर मुंजाजी ने जवाब दिया की...

ध्रुव चडे, मेरु डगे, गम मरडे गिरनार |
मरडे कयम मुलिधणी पग पाछा परमार ||

(चाहे ध्रुव सितारा अपनी जगह से हिल जाए, मेरु या गिरनार जैसे पर्वत अपनी जगह से हिल जाए पर अब ये परमार वंश का मुणी का धनि मुंजाजी पीछे नहीं हटेगा)

      इस तरह तीतर को लेकर दोनों पक्षों में घमासान मच गई, धीरे धीरे होकर परमार राजपुतो ने एक एक करके सभी चभाड शिकारियो का वध करने लगे | जिससे उन शिकारियो में हडकंप मच गया | जिसे देखकर वाघेला के सैन्य से कई लोगो ने और राणी के भाई ने मुंजाजी को घेर लिया और उनपे वार करने लगे, जिसके कारण मुंजाजी भी सहीद हो गए | जिसे देखकर बाकि परमार राजपुत शिकारियो पे टूट पडे | देखते ही देखते वहा पे 640 लोगो की लासे बिछ गई जिसमे 140 परमार राजपुत थे और 500 शिकारी सैन्य में थे | इस तरह मुणी का पादर एक रणमैदान में बदल गया |

       इसे देखकर मुंजाजी की माता जोमबाई को सत चढा और उन्होंने अपने बेटे के पीछे सती होने की ठान ली | उनको बहुत सारे लोगो ने मनाया पर उन्होंने ठान लि थी और मुंजाजी की चिता पर सती हो गई |

पडया चभाडह पांचसे, सोढा विशु सात |
एक तेतर ने कारणे अण राखी अखियात || १ ||

  इस तरह एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए 140 सोढा राजपुत 500 चभाड लोगो को मारकर रणमैदान में शहीद हो गए |इस बात की गवाही दे रहे स्मारक आज भी सौरास्ट्र के मुणी गाव में 800 साल से खड़े है |

धन्य हे ऐसे क्षत्रियो को जो एक जीव के लिए अपनी जान न्योछावर करने में पल भर के लिए भी नहीं झिझकते...!!!
संदर्भ एवम आभार - 
1--Rajput Vansh Sagar - Sodha/Parmar Vansh page no. 196 se 200
2--Shambhuprasad Harprasad Desai likhit - " Saurastra ka Itihas"
3--Rastriya Shayar Zaverchand Meghani likhit "Saurastra ni Rasdhar"
4-http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.in
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Friday, September 12, 2014

Samudra Dovan /manthan programme

Samudra Dovan /manthan programme

After gap of 70yrs Khariya sodha families celebrated and organised Samudra dovan/ mantahn programme in village at pond of Lawa ji maharaj on dated 7th sept 2014.
The first worship of Lord Ganesha, Shiva , Charbhuja and maa Durga held in town centre temple near Rawla Sodha pol/gate in morning 6:30 am.After Ganga pooja huge public converted in a road show or road relly. The relly started from Charbhuja temple and finished at Pond of Lawa ji maharaj temple. The precious and most valuable role played by youth in success , organization and complition of event. All senior respected persons provided their experience, guideline and valueble inputs for remarkable success of event.Appx 3000 peoples were attended this event. for join this event peoples arrived from Banglore , puna, madras , mumbai, punjab etc places.
Chaaran families not attended the event due to misshaping in their families.
In the closing ceremony lunch organised for outsider Guests by joint efforts of all Sodha rajput families at house of Sh Bhanwar singh sodha.
Remaining sharing in next post..........
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Saturday, February 15, 2014

The great 12 warriors of Rajasthan



🚩राजस्थान के शूरवीर राजपुताना हिंदूओ के 12 महान सत्य अवश्य पढियेगा,,

1. जयमाल मेड़तिया ने एक ही झटके में
हाथी का सिर काट डाला था.

2. करौली के जादोन राजा अपने सिंहासन पर
बैठते वक़्त अपने दोनो हाथ जिन्दा शेरो पर रखते
थे.

3. जोधपुर के यशवंत सिंह के 12 साल के पुत्र
पृथ्वी सिंह ने हाथो से औरंगजेब के खूंखार भूखे
जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था.

4. राणा सांगा के शरीर पर छोटे-बड़े 80 घाव थे,
युद्धों में घायल होने के कारण उनके एक हाथ
नही था एक पैर नही था, एक आँख नहीं थी उन्होंने
अपने जीवन-काल में 100 से भी अधिक युद्ध लड़े थे

5. एक राजपूत वीर जुंझार जो मुगलो से लड़ते वक्त
शीश कटने के बाद भी घंटो लड़ते रहे आज
उनका सिर बाड़मेर में है, जहा छोटा मंदिर हैं और
धड़ पाकिस्तान में है.

6. रायमलोत कल्ला का धड़ शीश कटने के बाद
लड़ता- लड़ता घोड़े पर पत्नी रानी के पास पहुंच
गया था तब रानी ने गंगाजल के छींटे डाले तब धड़
शांत हुआ उसके बाद रानी पति कि चिता पर
बैठकर सती हो गयी थी.

7. चित्तोड़ में अकबर से हुए युद्ध में जयमाल
राठौड़ पैर जख्मी होने कि वजह से
कल्ला जी के कंधे पर बैठ कर युद्ध लड़े थे, ये देखकर
सभी युद्ध-रत साथियों को चतुर्भुज भगवान
की याद आयी थी, जंग में दोनों के सर काटने के
बाद भी धड़ लड़ते रहे और राजपूतो की फौज ने
दुश्मन को मार गिराया !
अंत में अकबर ने उनकी वीरता से प्रभावित हो कर
जैमल और पत्ता जी की मुर्तिया आगरा के किलें में
लगवायी थी.

8. राजस्थान पाली में आउवा के ठाकुर खुशाल सिंह
1877 में अजमेर जा कर अंग्रेज अफसर का सर काट
कर ले आये थे और उसका सर अपने किले के
बाहर लटकाया था तब से आज दिन तक उनकी याद
में मेला लगता है.

9. महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80
किलो था और कवच का वजन 80
किलो था और कवच, भाला, ढाल, और हाथ मे
तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था.

10. सलूम्बर के नवविवाहित रावत रतन सिंह
चुण्डावत जी ने युद्ध जाते समय मोह-वश
अपनी पत्नी हाड़ा रानी की कोई
निशानी मांगी तो रानी ने
सोचा ठाकुर युद्ध में मेरे मोह के कारण नही लड़ेंगे
तब रानी ने निशानी के तौर
पैर अपना सर काट के दे दिया था,
अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब
की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और
वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृ भूमि के लिए
शहीद हो गये थे.

11. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000
सैनिक थे और अकबर की और से 85000 सैनिक थे फिर
भी अकबर की मुगल सेना पर हिंदू भारी पड़े थे.
घन्य थे वो हिन्दू।


12. Khariya sodha ki jung mai LAWA JI MAHARAJ ne sekdo choro se ladaayi kartey huye Gaayo ki raksha ki thi. Sheesh katne ke baad bhi ladtey rahe . AAj unke shir ki samaadi Sewali Nadi (Hewali naadi/ Shir vali naadi) parr hai jabki Dhard ki samaadhi  ½ km parr unke mandir mai viraajmaan hai.
JAI LAWA JI MAHARAJ.

Translation-
In Khariya sodha LAWAJI MAHARAJ had Great War with more than 100 thieves for freedom of Cows. During the war after cut of his head he continued his fight through remains body. In his historical memories two place are developed for worship. One place developed near the “Sewali Naadi” where his head was cut by thieves. The Sewali Naadi was known as Shir Wali Naadi (The Pond where head was dropped ) but due to pronunciation difference between local dialect and Hindi language this name concerted in Sewali/ Hewali Naadi. The second place is developed as a huge temple.
The Great Lwa ji Maharaj.
Sources- Dhiren sodha.
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